कैसे मरेगी दंगे की सोच ?
सियासत ने कभी दो भाईयों की जमीन को दो टुकड़ों में बांट दिया था। मगर तब पता नहीं था जमीन के दो टुकड़े होते ही दिलों के भी हजार टुकड़े हो जायेंगे। वतन को आजादी मिलते ही दो कौमों में खुशी के बदले मातम का सिलसिला जो शुरू हुआ वह आज भी जारी है। दंगे की कोख से ही आजाद भारत का जन्म हुआ था। अभी मुजफ्फनगर दंगे की आग भले ही ठंडी पड़ गई है, मगर दंगे के बाद जिस्म को बेजान बना देने वाली इस ठंड में राहत शिवरों में पनाह लिए वो लोग जो अपना सब कुछ गंवा चुके हैं उनका दर्द देखकर आपका कलेजा निकल आएगा। उनकी दुखों की इबारत उनकी बर्बादी की दास्तान बताती है। कैसे एक हिंदुस्तान का तबका आज इस आजाद लोकतंत्र में पीड़ा और अपमाननीय जिंदगी जीने को मजबूर है। यूं तो शुरू से अब तक दंगे की जमीन सियासत के सूरमा ही तैयार करते आ रहे हैं जिसमें नफरत की खाद्य-पानी देकर वोट की फसल काटी जा रही है। हमेशा हम दंगों के लिए सियासत को कटघरे में खड़े करते हैं मगर दंगे फैलाने में अपनी भागीदारी पर चुप्पी साध लेते हैं।
दंगों की शुरूआत अक्सर मजहबी उनमाद से शुरू होती है। मगर सवाल यह है कि आखिर एक अधर्मी कार्य कैसे किसी धर्म के कार्य का रूप ले लेता है। दुनिया के सभी धार्मिक पुस्तकें इंसानियत, सच्चाई , भाईचारगी और एकता की बातें करते हैं, जिसमें इंसानों की मदद करने के लिए कहा गया है और इसे ही सबसे बड़ा इंसानी धर्म बताया गया है। लेकिन अफसोस हम मजहब का चोला ओढ़े वोह भेडिय़ें हैं जो अपने फायदे के लिए धर्म की आड़ में मासूम इंसानी जिंदगियों को खा जाते हैं। आखिर यह कैसा मजहब का जुनून है जो इंसानी जिंदगियों को ही नासूर बना देते हैं। एक सवाल मजहब की दुहाई देने वालों माननीयों से भी है। जब दंगे में शहर जलता रहता है तब हमारे मजहब के ठेकेदार या यूं कहें धर्म गुरु कंबल ओढ़कर क्यों सोये रहते हैं। उन्हें फिक्र क्यों नहीं होती है लोगों के जान-माल की। दुनियाभर को मजहब की नेक बात बताने वाले हमारे मौलाना और पंडित क्यों नहीं आगे निकलकर दंगे की आग बुझाने के लिए आते हैं। वे जो मजहब का नाम लेकर एक दूसरे के गले काटने पर तुले रहते हैं, उन हाथों को खुदा या भगवान का वास्ता देकर क्यों नहीं रोक देते। क्या सिर्फ इनका फर्ज मस्जिदों और मंदिरों की तकरीरों और प्रवचन तक ही सीमित है। नहीं आप समाज की पाक आवाज हैं आपके लफ्ज समाज की नब्ज है। जिस समाज को ये सच्चाई की नसीहत देते हैं वे उसे बुड़ाई करने से भी तो रोक सकते हैं। वक्त आज फिर से आपको नसीहत कर रहा है दिन ब दिन कमजोर होती वतन की एकता की इमारत को आप ही मिलकर बचा सकते हैं।
सबसे बड़े दुख की बात यह है कि जिन नौजवान कंधों पर देश को संवारने उसे विकास के रास्ते पर लाकर खुशहाल करने की जिम्मेदारी होती है वही दंगा फैलाने में सबसे ज्यादा भागीदारी निभाते हैं। जिन हाथों पर इस बगिया को सींचने की जिम्मेवारी होती है वे ही इस बगिये को उजाड़ देते हैं। अफसोस तब और ज्यादा होता है जिन कलाईयों में देश की मां, बहने अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए भरोसे का धागा बांधती हैं वे ही दंगे के दौरान मजहब और जात के नाम पर उनकी अस्मत को ताड़-ताड़ कर देते हैं। वह हर रिश्ता अमर्यादित हो जाता है जिससे हिंदुस्तान का समाज बंधा होता है। ऐसा लगता है जो देश वीर जवानों और किसानों का था, जिनकी धड़कनों में गंगा-जमूनी तहजीब बस्ती थी आज वह जड़ से समाप्त होता दिखाई दे रहा है।
सच, आज फिर से युवा पीढ़ी को अपने अंदर गहराई से झांकने का वक्त आ गया है। उन्हें सोचना होगा की वतन किस पथ की ओर बढ़ रहा है। हम जब अपने ही देश को तोडग़ें, अपने देशवासियों की जान लेंगे तो फिर कैसे उनके सपनों को कैसे सच किया जाएगा, जो मुल्क को आजाद कराकर इसे आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी हम पर छोड़ गए हैं। मत भूलिए हम नौजवान हिंदुस्तान की सबसे बड़ी ताकत और उम्मीद हैं जिसके भरासे हिंदुस्तान सुपर पावर बनने के सपने देख रहा है। जब हम ही आपस में उलझ जायेंगे तो फिर कैसे सुलझेगा हमारे हिंदुस्तान के समाज की सतरंगी डोर, जिसके बलबूते विकास की पतंग उड़ाने की हम सोचते हैं।
हमें मिलकर फिर से जय जवान बनना पड़ेगा। सियासत की उस शैतानी सोच को दफ्न करना होगा जिससे दंगा फैलाने वाले सैकड़ों कारिंदे पैदा हो जाते हैं। हमें उन सारी साम्प्रदायिक शक्तियों से लोहा लेना होगा जो अबतक सिर्फ धर्म के नाम पर लोगों को गुमराह कर अपनी जेबें गर्म करते आ रहे हैं। उस अवाम को मजहब और जात जकड़ से निकाल कर तरक्की का फलसफा पढ़ाना होगा। जनता जब जागरुक होगी तब फैसले भी एक सेहतमंद सोच से करेगी। तब जाकर कहीं देंगे की घिनौनी सोच दफ्न होगी।
सियासत ने कभी दो भाईयों की जमीन को दो टुकड़ों में बांट दिया था। मगर तब पता नहीं था जमीन के दो टुकड़े होते ही दिलों के भी हजार टुकड़े हो जायेंगे। वतन को आजादी मिलते ही दो कौमों में खुशी के बदले मातम का सिलसिला जो शुरू हुआ वह आज भी जारी है। दंगे की कोख से ही आजाद भारत का जन्म हुआ था। अभी मुजफ्फनगर दंगे की आग भले ही ठंडी पड़ गई है, मगर दंगे के बाद जिस्म को बेजान बना देने वाली इस ठंड में राहत शिवरों में पनाह लिए वो लोग जो अपना सब कुछ गंवा चुके हैं उनका दर्द देखकर आपका कलेजा निकल आएगा। उनकी दुखों की इबारत उनकी बर्बादी की दास्तान बताती है। कैसे एक हिंदुस्तान का तबका आज इस आजाद लोकतंत्र में पीड़ा और अपमाननीय जिंदगी जीने को मजबूर है। यूं तो शुरू से अब तक दंगे की जमीन सियासत के सूरमा ही तैयार करते आ रहे हैं जिसमें नफरत की खाद्य-पानी देकर वोट की फसल काटी जा रही है। हमेशा हम दंगों के लिए सियासत को कटघरे में खड़े करते हैं मगर दंगे फैलाने में अपनी भागीदारी पर चुप्पी साध लेते हैं।
दंगों की शुरूआत अक्सर मजहबी उनमाद से शुरू होती है। मगर सवाल यह है कि आखिर एक अधर्मी कार्य कैसे किसी धर्म के कार्य का रूप ले लेता है। दुनिया के सभी धार्मिक पुस्तकें इंसानियत, सच्चाई , भाईचारगी और एकता की बातें करते हैं, जिसमें इंसानों की मदद करने के लिए कहा गया है और इसे ही सबसे बड़ा इंसानी धर्म बताया गया है। लेकिन अफसोस हम मजहब का चोला ओढ़े वोह भेडिय़ें हैं जो अपने फायदे के लिए धर्म की आड़ में मासूम इंसानी जिंदगियों को खा जाते हैं। आखिर यह कैसा मजहब का जुनून है जो इंसानी जिंदगियों को ही नासूर बना देते हैं। एक सवाल मजहब की दुहाई देने वालों माननीयों से भी है। जब दंगे में शहर जलता रहता है तब हमारे मजहब के ठेकेदार या यूं कहें धर्म गुरु कंबल ओढ़कर क्यों सोये रहते हैं। उन्हें फिक्र क्यों नहीं होती है लोगों के जान-माल की। दुनियाभर को मजहब की नेक बात बताने वाले हमारे मौलाना और पंडित क्यों नहीं आगे निकलकर दंगे की आग बुझाने के लिए आते हैं। वे जो मजहब का नाम लेकर एक दूसरे के गले काटने पर तुले रहते हैं, उन हाथों को खुदा या भगवान का वास्ता देकर क्यों नहीं रोक देते। क्या सिर्फ इनका फर्ज मस्जिदों और मंदिरों की तकरीरों और प्रवचन तक ही सीमित है। नहीं आप समाज की पाक आवाज हैं आपके लफ्ज समाज की नब्ज है। जिस समाज को ये सच्चाई की नसीहत देते हैं वे उसे बुड़ाई करने से भी तो रोक सकते हैं। वक्त आज फिर से आपको नसीहत कर रहा है दिन ब दिन कमजोर होती वतन की एकता की इमारत को आप ही मिलकर बचा सकते हैं।
सबसे बड़े दुख की बात यह है कि जिन नौजवान कंधों पर देश को संवारने उसे विकास के रास्ते पर लाकर खुशहाल करने की जिम्मेदारी होती है वही दंगा फैलाने में सबसे ज्यादा भागीदारी निभाते हैं। जिन हाथों पर इस बगिया को सींचने की जिम्मेवारी होती है वे ही इस बगिये को उजाड़ देते हैं। अफसोस तब और ज्यादा होता है जिन कलाईयों में देश की मां, बहने अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए भरोसे का धागा बांधती हैं वे ही दंगे के दौरान मजहब और जात के नाम पर उनकी अस्मत को ताड़-ताड़ कर देते हैं। वह हर रिश्ता अमर्यादित हो जाता है जिससे हिंदुस्तान का समाज बंधा होता है। ऐसा लगता है जो देश वीर जवानों और किसानों का था, जिनकी धड़कनों में गंगा-जमूनी तहजीब बस्ती थी आज वह जड़ से समाप्त होता दिखाई दे रहा है।
सच, आज फिर से युवा पीढ़ी को अपने अंदर गहराई से झांकने का वक्त आ गया है। उन्हें सोचना होगा की वतन किस पथ की ओर बढ़ रहा है। हम जब अपने ही देश को तोडग़ें, अपने देशवासियों की जान लेंगे तो फिर कैसे उनके सपनों को कैसे सच किया जाएगा, जो मुल्क को आजाद कराकर इसे आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी हम पर छोड़ गए हैं। मत भूलिए हम नौजवान हिंदुस्तान की सबसे बड़ी ताकत और उम्मीद हैं जिसके भरासे हिंदुस्तान सुपर पावर बनने के सपने देख रहा है। जब हम ही आपस में उलझ जायेंगे तो फिर कैसे सुलझेगा हमारे हिंदुस्तान के समाज की सतरंगी डोर, जिसके बलबूते विकास की पतंग उड़ाने की हम सोचते हैं।
हमें मिलकर फिर से जय जवान बनना पड़ेगा। सियासत की उस शैतानी सोच को दफ्न करना होगा जिससे दंगा फैलाने वाले सैकड़ों कारिंदे पैदा हो जाते हैं। हमें उन सारी साम्प्रदायिक शक्तियों से लोहा लेना होगा जो अबतक सिर्फ धर्म के नाम पर लोगों को गुमराह कर अपनी जेबें गर्म करते आ रहे हैं। उस अवाम को मजहब और जात जकड़ से निकाल कर तरक्की का फलसफा पढ़ाना होगा। जनता जब जागरुक होगी तब फैसले भी एक सेहतमंद सोच से करेगी। तब जाकर कहीं देंगे की घिनौनी सोच दफ्न होगी।