पत्रकार नहीं, ... "मीडिया" की हालत हड्ड़ी के लिए लड़ते कुत्ते की तरह हो गई है। इसलिए ऋषि कपूर ने कहा दिल्ली के मीडियावालों से एक बुक लॉंच के दौरान " आ गए मुफ्त की दारू पीने " ... ऋषि ने आपकी हालत पर ठीक ही कहा है। सोचो न थोड़ा सन्नाटे में जाकर पत्रकार दोस्तों, कोई क्यों जब चाहे गाहे-बेगाहे आपको प्रोटिटूइट , दलाल, टुकड़खोर कह देता है। क्या वजूद बनाकर रख दिया है आपका, मीडिया संस्थानों ने , एक गली के आवारा कुत्ते के बराबर। दरअसल, उसने आपको आपकी गरिमा, स्वाभिमान और आत्मसम्मान के साथ सत्तर गज ज़मीन के भीतर दफ़्न कर दिया है। जहां से आप बाहर आ भी आ भी जाते हैं, तो मुर्दा बनकर लौटते हैं। जिसका अपना कोई अस्तित्व नहीं होता , जहाँ निराशा के अंधकार में ही खत्म हो जाती है आपकी योग्यता। क्या हमने पत्रकारिता की शिक्षा लेते वक़्त ऐसे जीने, ऐसे ही काम करने का संकल्प लिया था। मैं जानता हूँ की आपकी मजबूरियां हैं, जो अब आपकी कमजोरियां बन गई हैं। लेकिन संघर्ष करना होगा इस वजूद के महीन धागे को बचाये रखने को।
हां , जनता, बोले तो पब्लिक आपको भी बेबस होते लोकतंत्र की इन लाठियों को मज़बूत बनाने के लिए साथ देना होगा। शिकायत तो करनी होगी बहके हुए कलमों के संस्थानों से। उनसे पूछिए अपने जनाधिकार से, कि अखबार और चैनल में सिर्फ सेवक यानी की नेता मंत्री की खबर क्यों छपती हैं, झूठ और मक्कारी से भरी खबरों की कितनी कीमतें वसूलते हैं। उनसे पूछिए लोकतंत्र के मालिक यानि जनता के सरोकार से जुड़ीं खबरें प्रमुखता से गायब क्यों रहती हैं, लोकतंत्र में विरोध की आवाजों को अनसुना क्यों किया जा रहा है। उन्हें क्यों जगह नहीं मिल रही अख़बारों में, उनको आवाज जगह क्यों नहीं मिल रही चैनलों में। आज न कल आपको बुनियादी सवालों को लेकर सवाल की फेहरिस्त मीडिया को पकड़ानी होगी।
एक संसथान को आपको पत्रकारिता में बदलना होगा। पत्रकार के उस खौफ को खत्म करने के लिए आपको लड़ना होगा। उसकी आज़ादी के लिए लड़ना होगा। आपको हिम्मत फूंकनी होगी मीडिया की व्यवस्था से सताये गए पत्रकार के भीतर। और जरूरी है आपके भी नागरिक बने रहने के वजूद के लिए। क्योंकि एक साथी ने कहा था । ... एक डरा हुआ पत्रकार, लोकतंत्र में मरा हुआ नागरिक पैदा करता है।
हां , जनता, बोले तो पब्लिक आपको भी बेबस होते लोकतंत्र की इन लाठियों को मज़बूत बनाने के लिए साथ देना होगा। शिकायत तो करनी होगी बहके हुए कलमों के संस्थानों से। उनसे पूछिए अपने जनाधिकार से, कि अखबार और चैनल में सिर्फ सेवक यानी की नेता मंत्री की खबर क्यों छपती हैं, झूठ और मक्कारी से भरी खबरों की कितनी कीमतें वसूलते हैं। उनसे पूछिए लोकतंत्र के मालिक यानि जनता के सरोकार से जुड़ीं खबरें प्रमुखता से गायब क्यों रहती हैं, लोकतंत्र में विरोध की आवाजों को अनसुना क्यों किया जा रहा है। उन्हें क्यों जगह नहीं मिल रही अख़बारों में, उनको आवाज जगह क्यों नहीं मिल रही चैनलों में। आज न कल आपको बुनियादी सवालों को लेकर सवाल की फेहरिस्त मीडिया को पकड़ानी होगी।
एक संसथान को आपको पत्रकारिता में बदलना होगा। पत्रकार के उस खौफ को खत्म करने के लिए आपको लड़ना होगा। उसकी आज़ादी के लिए लड़ना होगा। आपको हिम्मत फूंकनी होगी मीडिया की व्यवस्था से सताये गए पत्रकार के भीतर। और जरूरी है आपके भी नागरिक बने रहने के वजूद के लिए। क्योंकि एक साथी ने कहा था । ... एक डरा हुआ पत्रकार, लोकतंत्र में मरा हुआ नागरिक पैदा करता है।


