Friday, 15 December 2017

आपको भी हमारे लिए लड़ना होगा

पत्रकार नहीं, ...  "मीडिया" की हालत हड्ड़ी के लिए लड़ते कुत्ते की तरह हो गई है। इसलिए ऋषि कपूर ने कहा दिल्ली के मीडियावालों से एक बुक लॉंच के दौरान " आ गए मुफ्त की दारू पीने  " ... ऋषि ने आपकी हालत पर ठीक ही कहा है। सोचो न थोड़ा सन्नाटे में जाकर पत्रकार दोस्तों, कोई क्यों जब चाहे गाहे-बेगाहे आपको प्रोटिटूइट , दलाल, टुकड़खोर कह देता है। क्या वजूद बनाकर रख दिया है आपका, मीडिया संस्थानों ने , एक गली के आवारा कुत्ते के बराबर। दरअसल, उसने आपको आपकी गरिमा, स्वाभिमान और आत्मसम्मान के साथ सत्तर गज ज़मीन के भीतर दफ़्न कर दिया है। जहां से आप बाहर आ भी आ भी जाते हैं, तो मुर्दा बनकर लौटते हैं। जिसका अपना कोई अस्तित्व नहीं होता , जहाँ निराशा के अंधकार में ही खत्म हो जाती है आपकी  योग्यता। क्या हमने पत्रकारिता की शिक्षा लेते वक़्त ऐसे जीने, ऐसे ही काम करने का संकल्प लिया था। मैं जानता हूँ की आपकी मजबूरियां हैं, जो अब आपकी कमजोरियां बन गई हैं। लेकिन संघर्ष करना होगा इस वजूद के महीन धागे को बचाये रखने को।
 हां , जनता, बोले तो पब्लिक आपको भी बेबस होते लोकतंत्र की इन लाठियों को मज़बूत बनाने के लिए साथ देना होगा। शिकायत तो करनी होगी बहके हुए कलमों के  संस्थानों से। उनसे पूछिए अपने जनाधिकार से, कि अखबार और चैनल में सिर्फ सेवक यानी की नेता मंत्री की खबर क्यों छपती हैं, झूठ और मक्कारी से भरी खबरों की कितनी कीमतें वसूलते हैं। उनसे पूछिए लोकतंत्र के मालिक यानि जनता के सरोकार से जुड़ीं खबरें प्रमुखता से गायब क्यों रहती हैं, लोकतंत्र में विरोध की आवाजों को अनसुना क्यों किया जा रहा है। उन्हें क्यों जगह नहीं मिल रही अख़बारों में, उनको आवाज जगह क्यों नहीं मिल रही चैनलों में। आज न कल आपको बुनियादी सवालों को लेकर सवाल की फेहरिस्त मीडिया को पकड़ानी होगी।
एक संसथान को आपको पत्रकारिता में बदलना होगा। पत्रकार के उस खौफ को खत्म करने के लिए आपको लड़ना होगा। उसकी आज़ादी के लिए लड़ना होगा। आपको हिम्मत फूंकनी होगी मीडिया की व्यवस्था से सताये गए पत्रकार के भीतर। और जरूरी है आपके भी नागरिक बने रहने के वजूद के लिए। क्योंकि एक साथी ने कहा था । ... एक डरा हुआ पत्रकार, लोकतंत्र में मरा हुआ नागरिक पैदा करता है। 

Monday, 14 August 2017

इस उम्मीद को टूटने मत देना ....


देश तभी बचेगा, जब हमारी सोच गुलामी की ज़ंज़ीर से आज़ाद होगी। किसी का फैन या भक्त मत बनिए। हमारे नौजवान खुद सोचे, तय करे की उसे क्या चाहिए, क्या नहीं। आप सवाल करना सीखिए। किसी के पीछे आँख मूँद कर चलना भी एक तरह की गुलामी है। जब तक आप ज़िम्मेदारों से सवाल करना नहीं सीखेंगे, उन्हें इनकी जिम्म्मेदारी का एहसास नहीं कराएँगे वो आराम से हमारी-आपकी कमाई पर मजे लूटते रहेंगे। ज़िम्मेदारी का एहसास कराना ही लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है, जिस दिन आप अंधे बहरे होकर चलेंगे, हुक्मरानों से सवाल करना छोड़ देंगे दरअसल उसी दिन हमारी ज़िंदा ज़म्हूरियत दफ़न हो जाएगी। बहुत क़ुर्बानियों के बाद हमने कुछ पाया है। याद रखिये .. हम नौजवान इस मुल्क की सबसे बड़ी ताकत और उम्मीद हैं। अगर इसे क्रांति में बदल दिया जाये तो बड़ी से बड़ी सत्ता को उखाड़कर फ़ेंक सकता है। हमें किसी भी कीमत अपनी एकता और इंसानियत को नहीं मरने देना चाहिए। किसी भी हालत में इस उम्मीद को टूटने मत देना दोस्तों।
इंक़लाब ज़िंदाबाद।
यौमे आज़ादी की 71वीं सालगिरह मुबारक हो

Monday, 15 May 2017

सत्ता का रौब बेशर्मी की सीमाएं लाँघ देता है

 देश की रक्षा में कश्मीर के पूंछ में जवान शहीद होता है। शरीर उत्तर प्रदेश के देवरिया के एक गांव पहुँचती है। अंतिम संस्कार होता है जवान का। बड़के लोग गायब रहते हैं। गांव के हिन्दू-मुस्लिम हर तबके के लोग दुःख की घड़ी में शहीद परिवार के साथ होते हैं। कई दिन बाद नेता की नींद टूटती है। सीएम को शहीद परिवार से मिलने का ख्याल आता है। छोटे अधिकारी से बड़े अधिकारी शहीद परिवार के घर पहुंचते हैं, सीएम के आव भाव में एसी से लेकर सफाई चिकनाई के साथ सोफा सेट की व्यवस्था करते हैं। परिवार को लगा शायद बेटे की शहादत के सम्मान में इतनी सुविधााओं का इंतजाम किया जा रहा है। नेता यानी की सीएम, शहीद परिवार से मिलने आता है। कुछ बातें करता है, दिलासा देता है ,फिर बड़ी सी गाड़ी में लाव-लश्कर के साथ चला जाता है। उसके बाद सीएम के अधिकारी सोफा सेट से लेकर एसी उखाड़ कर ले जाते हैं। शहीद हुए लाल के माँ-बाप चुपचाप पथराई और हैरानी से भरी आँखों से बेटे के सम्मान को ठेस लगते देखते रहते हैं। ज़ेहन में सवाल तो आया होगा न उस माँ को, आखिर क्या पाया मैंने अपने लाल को खोकर ? क्यों बेटे को भेजा था सरहद पर ? एक सम्मान तक नहीं ? क्या हमें सैनिक की ,जवान की राष्ट्रवाद के नाम पर सिर्फ जान चाहिए। क्या उसके खून का मोल नहीं। एक सैनिक जब मरता है, तो सिर्फ एक इंसान नहीं मरता, उसका पूरा परिवार मर जाता है। और जब उसकी बेइज़्ज़ती पर हम खामोश हो जाते हैं तो पूरा देश मर जाता है।

Friday, 12 May 2017

बिकता क्या नहीं हुजूर ......

बिकता क्या नहीं है, मगर बिकाऊ सिर्फ पत्रकार होता है। मालिकों की शमशीर, वक़्त की बेबसी और समाज की उम्मीदों के हाशिये पर खड़ा पत्रकार आज के दौर में नैतिकता के बैरोमीटर पर सबसे ज्यादा आसानी से किया जानेवाला शिकार है। आपको बदबूदार पत्रकारिता और पत्रकार पर बोलकर, गलियाकर तसल्ली मिलती है, दिल का गुबार निकलता है। और महसूस होता है की हमने समाज के लिए कुछ किया है, कुछ तो हवाई क्रांति की है।..... मगर आप भ्रम में हैं। जरा याद कीजिये कि ईमानदारी और नैतिकता की दुहाई देने वाला समाज आखरी बार पत्रकार के साथ कब खड़ा हुआ है। निजी तौर पर आपने कब किसी गली, गांव के पत्रकार से उसके दिल का हाल जाना है। पिछली बार आप कब उसके घर गए हैं हाल जानने। रोज -रोज जान से मारने और ज़िंदा जलाने की धमकियों के दौर में कभी उसमें आपने हिम्मत फूंकी है, कब उससे कहा है, तू घबरा मत, चिंता मत कर ,मैं और ये समाज तेरे साथ है। खराब खबर को लेकर आपने कभी या कितनी बार चिट्ठी, ईमेल , या अखबार के दफ्तर जा कर शिकायत की होगी। आपको चाहिए सबकुछ साफ़ और क्रांति टाइप बदलाव ,मगर खुद की नैतिकता के लिए ढेला बराबर भी ज़िम्मेदरी नहीं उठाएंगे। जिस पत्रकार से आप समाज और सलतनत से टकराने की उम्मीद पाले बैठे हैं, तो आपको भी उसके साथ इस जंग में खड़ा होना होगा।
नोट -मेरी टिप्पणी अगर आपको आहत करती है तो, मुझे फर्क नहीं पड़ता। क्योंकि आप ही हैं जो दंगे में मजहब के नाम पर एक दूसरे के घर जलाते हैं, नाम देखकर दूकान जलाते हैं, एक दूसरे के गले काटते हैं। सरकार से सवाल पर अपने भक्ति का प्रमाण दिखा देते हैं।

Monday, 17 April 2017

पांच लाख बेटियों को निगल गया दहेज दानव


इन दिनों तीन तलाक पर कोहराम मचा है। मीडिया सइ लेकर पढ़े लिखे और जाहिल तक इसमें कूद पड़े हैं। जानकारी की दरिद्रता होने के बावजूद हर कोई सोशल मीडिया पर अपना ज्ञान बघार रहा है। और ज्ञान वो भी बघार रहा है जो मोटा दहेज लेकर महिला सशक्तिकरण पर छाती पीट रहा है। आज के दौर में महिलाओं पर हो रहे रहे अत्याचार का सबसे ज्यादा दर्दनाक ताल्लुक दहेज प्रथा जैस अमानवीय सामाजिक प्रथा से है। दहेज की भूख ने न जाने कितनी बेटियों को राख में तब्दील कर दिया। आज जब बेटियों पैदा होती हैं बाप आने वाले वक्त में दहेज के बोझ से कांप उठता है। उसे उसकी बेटियां बोझ लगने लगती हैं। समाज की इस बदजेहनियत ने बेटियों से उनकी खुशियां छीन ली हैं। हमारा सोशल सिस्टम इतना मर्दवादी है कि वह औरतों के जीने के सारे अधिकार अपने पास रखना चाहता है। नीचता की हद यह कि वह महिला को अपना जीवन साथी चुनने के लिए दहेज का सहारा लेता है।  और जब मर्दवादी समाज का जी इससे भी नहीं भरता तो दहेज और लालच में हैवानियत की सीमा को लांघ कर उसकी हत्या कर जाता है।
ये हमारे मुल्क का कैसा सामाजिक निजाम है जिसमें हमारी बेटियां जीने के लिए सांस तक नहीं ले सकतीं।
यह कैसा समाज है जो अपनी ही गोद में पली बढ़ी बेटियों को दहेज की बेदी पर बलि चढ़ा देता है।
इंडियन नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक साल 2012 में दहेज ने 18,233 बेटियों की जान ले ली। इंडियन नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो कहना है की देश में हर 90 मिनट में एक बेटी दहेज की वजह से मारी जाती है। ब्यूरो कहना है कि देश में हर साल 10 हजार महिलाओं की मौतों में से 1.4 चौथाई हिस्सा दहेज से सम्बंधित होता है। एनसीआरबी के मुताबिक साल 1996 में दहेज के कारण 2500 से ज्यादा बेटियों को जलाकर मार दिया गया। जबकि साल 2011 में दहेज हत्या से जुड़े 8331 मामले दर्ज किए गए। जहां दहेज हत्या के मामले 1998 में 7146 थे वहीं 2008 में यह बढ़कर 8172 हो गए।
रिकॉर्ड कहता है कि वर्ष 2007 से 2011 के बीच देश में दहेज हत्याओं के मामलों में तेजी आई है। वर्ष 2007 में ऐसे 8,093 मामले दर्ज हुए लेकिन वर्ष 2008 और 2009 में यह आंकड़ा क्रमश: 8,172 और 8,383 था। महिला और बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने लोकसभा में एक सवाल के जवाब में कहा कहा था कि साल 2012 -20 14 के दौरान करीब 25000 हजार महिलाओं ने दहेज की प्रताडऩा के कारण आत्महत्या कर ली या फिर उन्हें मार दिया गया। आगे सरकारी आंकडों का जिक्र करते हुए बताया गया था की साल 2016 में रोजाना तकरीबन 20 महिलाएं दहेज उत्पीडऩ के कारण मारी जा रही हैं। भारत में उसी साल 4,68,000 महिलाओं को देहज के विभिन्न हिस्सों में दहेज के कारण  मार दिया गया। राउंड फिगर में दहेज की बलि चढऩे का यह सिलसिला पांच लाख तक पहुंच जाता है। ये वो
आंकड़े हैं जो सरकारी दस्तावेज में जमां हैं, वरना ना जाने ऐसे कितने ही मामले होंगे जहां पुलिस दहेज हत्या और उत्पीडऩ से सम्बंधित मामले दर्ज तक नहीं करती।
बहरहाल, दहेज एक ऐसा दानव है, जो सामाजिक रूप से खूंखार है। जिसकी रक्षा हमारा समाज खुद करता है, ताकि वो हमारी बेटियों की निगल सके। समाज अपनी ही बेटियों की बलि ले रहा है। जरूरत है इस खतरनाक सामाजिक प्रथा के खिलाफ खड़े होने की, वरना वो वक्त दूर नहीं जब इस बगिया से खूबसूरत फूल ही खत्म हो जाएंगे। रह जाएंगी तो सिर्फ कंटीली झारियां।

Sunday, 8 February 2015

बोल वरना वो खामोश कर देंगे

अंग-अंग जख्मी है तेरा, लम्हा-लम्हा फरयादी है
खोल जुबां अब बोल, बोलने की तुझ को भी आजादी है
चल दिखा दे सारी दुनिया को तेरी सांसों में भी है आंधी
बता दुनिया को क्रांति वही करता है जो जालिम से डरता नहीं
हिम्मत, होसला जो रखता है वही समाज को बदलता है
जो हिम्मत न हारे, जिंदगी वही संवारे

बोल वरना वो खामोश कर देंगे

अंग-अंग जख्मी है तेरा, लम्हा-लम्हा फरयादी है
खोल जुबां अब बोल, बोलने की तुझ को भी आजादी है
चल दिखा दे सारी दुनिया को तेरी सांसों में भी है आंधी
बता दुनिया को क्रांति वही करता है जो जालिम से डरता नहीं
हिम्मत, होसला जो रखता है वही समाज को बदलता है
जो हिम्मत न हारे, जिंदगी वही संवारे