Monday, 2 January 2012

ये दंगे तो दिलों को जलाते हैं

इन दिनों भरतपुर जिले के गोपालगंज गांव में दंगे की आग इंसानी जिंदगी के जलने और उत्तराखण्ड के रुद्रपुर में फसाद से भारत में एक बार फिर सांप्रादायिक शक्तियां भड़क उठी हैं। इन हालातों से सहमा देश सवाल पूछता है, कब मिलेगी हिंदुस्तान को फसाद से निजात? सवाल अहम हैं मगर इसके जवाब बड़े सरल हैं। और हम जानते हैं, फसाद या दंगे तो दिलों को जलाते हैं व इंसानियत को को मारते हैं, तो जिला दो इंसानियत को दफन कर दो दंगो की सोच को अपने दिलों में, ताकि भाई-भाई के दिलों में दड़ार न हो सके। दंगे में इंसान जलते हैं, मकान जलते हैं, दुकाने जलती हैं, कोई शमशान को जाता है तो कोई कब्रिस्तान को, बहते हैं मातम के आंसू, नफरत के अंगारों पर चलते हैं हम, ये जानते हुए की नुकसान है हमारा और फायदा उन सियासतदानों का, जिन्हें हमारे अपनों की लााशों पर नफरत के चुल्हे जलाकर रोटी सेंकने की आदत है, तो आज ही से करो फैसला, न करेंगे दंगे और न होने देंगे, क्योंकि दंगे तो दिलों को जलाते हैं, भाई को भाई की गर्दन काटने के लिए उकसाते हैं। फिर क्यों सुने इन फसादी सियासतदानों की आवाज? अब तो इनकी साजिश को नाकाम बनाकर इनकी सियासत की दुकान को जलाना है। समझ लो सियासत की जद में रहकर समाज को तोडऩे वाले सियासतदानों।
इस मुल्क के हिंदू मुस्लिमों के दिलों का रिश्ता तो सदियों पुराना है और गवाह इतिहास से लेकर सारा जमाना है।
 

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