Monday, 17 April 2017

पांच लाख बेटियों को निगल गया दहेज दानव


इन दिनों तीन तलाक पर कोहराम मचा है। मीडिया सइ लेकर पढ़े लिखे और जाहिल तक इसमें कूद पड़े हैं। जानकारी की दरिद्रता होने के बावजूद हर कोई सोशल मीडिया पर अपना ज्ञान बघार रहा है। और ज्ञान वो भी बघार रहा है जो मोटा दहेज लेकर महिला सशक्तिकरण पर छाती पीट रहा है। आज के दौर में महिलाओं पर हो रहे रहे अत्याचार का सबसे ज्यादा दर्दनाक ताल्लुक दहेज प्रथा जैस अमानवीय सामाजिक प्रथा से है। दहेज की भूख ने न जाने कितनी बेटियों को राख में तब्दील कर दिया। आज जब बेटियों पैदा होती हैं बाप आने वाले वक्त में दहेज के बोझ से कांप उठता है। उसे उसकी बेटियां बोझ लगने लगती हैं। समाज की इस बदजेहनियत ने बेटियों से उनकी खुशियां छीन ली हैं। हमारा सोशल सिस्टम इतना मर्दवादी है कि वह औरतों के जीने के सारे अधिकार अपने पास रखना चाहता है। नीचता की हद यह कि वह महिला को अपना जीवन साथी चुनने के लिए दहेज का सहारा लेता है।  और जब मर्दवादी समाज का जी इससे भी नहीं भरता तो दहेज और लालच में हैवानियत की सीमा को लांघ कर उसकी हत्या कर जाता है।
ये हमारे मुल्क का कैसा सामाजिक निजाम है जिसमें हमारी बेटियां जीने के लिए सांस तक नहीं ले सकतीं।
यह कैसा समाज है जो अपनी ही गोद में पली बढ़ी बेटियों को दहेज की बेदी पर बलि चढ़ा देता है।
इंडियन नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक साल 2012 में दहेज ने 18,233 बेटियों की जान ले ली। इंडियन नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो कहना है की देश में हर 90 मिनट में एक बेटी दहेज की वजह से मारी जाती है। ब्यूरो कहना है कि देश में हर साल 10 हजार महिलाओं की मौतों में से 1.4 चौथाई हिस्सा दहेज से सम्बंधित होता है। एनसीआरबी के मुताबिक साल 1996 में दहेज के कारण 2500 से ज्यादा बेटियों को जलाकर मार दिया गया। जबकि साल 2011 में दहेज हत्या से जुड़े 8331 मामले दर्ज किए गए। जहां दहेज हत्या के मामले 1998 में 7146 थे वहीं 2008 में यह बढ़कर 8172 हो गए।
रिकॉर्ड कहता है कि वर्ष 2007 से 2011 के बीच देश में दहेज हत्याओं के मामलों में तेजी आई है। वर्ष 2007 में ऐसे 8,093 मामले दर्ज हुए लेकिन वर्ष 2008 और 2009 में यह आंकड़ा क्रमश: 8,172 और 8,383 था। महिला और बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने लोकसभा में एक सवाल के जवाब में कहा कहा था कि साल 2012 -20 14 के दौरान करीब 25000 हजार महिलाओं ने दहेज की प्रताडऩा के कारण आत्महत्या कर ली या फिर उन्हें मार दिया गया। आगे सरकारी आंकडों का जिक्र करते हुए बताया गया था की साल 2016 में रोजाना तकरीबन 20 महिलाएं दहेज उत्पीडऩ के कारण मारी जा रही हैं। भारत में उसी साल 4,68,000 महिलाओं को देहज के विभिन्न हिस्सों में दहेज के कारण  मार दिया गया। राउंड फिगर में दहेज की बलि चढऩे का यह सिलसिला पांच लाख तक पहुंच जाता है। ये वो
आंकड़े हैं जो सरकारी दस्तावेज में जमां हैं, वरना ना जाने ऐसे कितने ही मामले होंगे जहां पुलिस दहेज हत्या और उत्पीडऩ से सम्बंधित मामले दर्ज तक नहीं करती।
बहरहाल, दहेज एक ऐसा दानव है, जो सामाजिक रूप से खूंखार है। जिसकी रक्षा हमारा समाज खुद करता है, ताकि वो हमारी बेटियों की निगल सके। समाज अपनी ही बेटियों की बलि ले रहा है। जरूरत है इस खतरनाक सामाजिक प्रथा के खिलाफ खड़े होने की, वरना वो वक्त दूर नहीं जब इस बगिया से खूबसूरत फूल ही खत्म हो जाएंगे। रह जाएंगी तो सिर्फ कंटीली झारियां।

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