Friday, 12 May 2017

बिकता क्या नहीं हुजूर ......

बिकता क्या नहीं है, मगर बिकाऊ सिर्फ पत्रकार होता है। मालिकों की शमशीर, वक़्त की बेबसी और समाज की उम्मीदों के हाशिये पर खड़ा पत्रकार आज के दौर में नैतिकता के बैरोमीटर पर सबसे ज्यादा आसानी से किया जानेवाला शिकार है। आपको बदबूदार पत्रकारिता और पत्रकार पर बोलकर, गलियाकर तसल्ली मिलती है, दिल का गुबार निकलता है। और महसूस होता है की हमने समाज के लिए कुछ किया है, कुछ तो हवाई क्रांति की है।..... मगर आप भ्रम में हैं। जरा याद कीजिये कि ईमानदारी और नैतिकता की दुहाई देने वाला समाज आखरी बार पत्रकार के साथ कब खड़ा हुआ है। निजी तौर पर आपने कब किसी गली, गांव के पत्रकार से उसके दिल का हाल जाना है। पिछली बार आप कब उसके घर गए हैं हाल जानने। रोज -रोज जान से मारने और ज़िंदा जलाने की धमकियों के दौर में कभी उसमें आपने हिम्मत फूंकी है, कब उससे कहा है, तू घबरा मत, चिंता मत कर ,मैं और ये समाज तेरे साथ है। खराब खबर को लेकर आपने कभी या कितनी बार चिट्ठी, ईमेल , या अखबार के दफ्तर जा कर शिकायत की होगी। आपको चाहिए सबकुछ साफ़ और क्रांति टाइप बदलाव ,मगर खुद की नैतिकता के लिए ढेला बराबर भी ज़िम्मेदरी नहीं उठाएंगे। जिस पत्रकार से आप समाज और सलतनत से टकराने की उम्मीद पाले बैठे हैं, तो आपको भी उसके साथ इस जंग में खड़ा होना होगा।
नोट -मेरी टिप्पणी अगर आपको आहत करती है तो, मुझे फर्क नहीं पड़ता। क्योंकि आप ही हैं जो दंगे में मजहब के नाम पर एक दूसरे के घर जलाते हैं, नाम देखकर दूकान जलाते हैं, एक दूसरे के गले काटते हैं। सरकार से सवाल पर अपने भक्ति का प्रमाण दिखा देते हैं।

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