Monday, 15 May 2017

सत्ता का रौब बेशर्मी की सीमाएं लाँघ देता है

 देश की रक्षा में कश्मीर के पूंछ में जवान शहीद होता है। शरीर उत्तर प्रदेश के देवरिया के एक गांव पहुँचती है। अंतिम संस्कार होता है जवान का। बड़के लोग गायब रहते हैं। गांव के हिन्दू-मुस्लिम हर तबके के लोग दुःख की घड़ी में शहीद परिवार के साथ होते हैं। कई दिन बाद नेता की नींद टूटती है। सीएम को शहीद परिवार से मिलने का ख्याल आता है। छोटे अधिकारी से बड़े अधिकारी शहीद परिवार के घर पहुंचते हैं, सीएम के आव भाव में एसी से लेकर सफाई चिकनाई के साथ सोफा सेट की व्यवस्था करते हैं। परिवार को लगा शायद बेटे की शहादत के सम्मान में इतनी सुविधााओं का इंतजाम किया जा रहा है। नेता यानी की सीएम, शहीद परिवार से मिलने आता है। कुछ बातें करता है, दिलासा देता है ,फिर बड़ी सी गाड़ी में लाव-लश्कर के साथ चला जाता है। उसके बाद सीएम के अधिकारी सोफा सेट से लेकर एसी उखाड़ कर ले जाते हैं। शहीद हुए लाल के माँ-बाप चुपचाप पथराई और हैरानी से भरी आँखों से बेटे के सम्मान को ठेस लगते देखते रहते हैं। ज़ेहन में सवाल तो आया होगा न उस माँ को, आखिर क्या पाया मैंने अपने लाल को खोकर ? क्यों बेटे को भेजा था सरहद पर ? एक सम्मान तक नहीं ? क्या हमें सैनिक की ,जवान की राष्ट्रवाद के नाम पर सिर्फ जान चाहिए। क्या उसके खून का मोल नहीं। एक सैनिक जब मरता है, तो सिर्फ एक इंसान नहीं मरता, उसका पूरा परिवार मर जाता है। और जब उसकी बेइज़्ज़ती पर हम खामोश हो जाते हैं तो पूरा देश मर जाता है।

No comments:

Post a Comment